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Dada Ka Darbar Suhana Lagta Hai

दादा का दरबार सुहाना लगता है | Dada Ka Darbar Suhana Lagta Hai

Pankaj Jain

Stotra

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Lyrics of Dada Ka Darbar Suhana Lagta Hai by Stavan.co

ॐ नमोऽर्हते भगवते, परमात्मने, परम-ज्योतिषे, परम-परमेष्ठिने, परम-वेधसे, परम-योगिने, परमेश्वराय, तमसः परस्तात्, सदोदिता दित्यवर्णाय, समूलोन्मूलिता-नादि-सकल-क्लेशाय ॥1॥


ॐ नमोऽर्हते भू-भुवः-स्वस्त्रयी-नाथ-मौलि-मन्दार-मालार्चित-क्रमाय, सकल-पुरुषार्थ-योनि-निरवद्य-विद्या-प्रवर्तनैक- वीराय, . नमःस्वस्ति-स्वधा स्वाहा-वषडथै-कान्त-शान्त-मूर्तये भवद्-भावि-भूत-भावा-वभासिने . काल-पाश-नाशिने, सत्व-रजस्तमो-गुणातीताय अनन्त-गुणाय, वाड्-मनो गोचर-चरित्राय, पवित्राय, करण-कारणाय, तरण-तारणाय, सात्त्विक-दैवताय, तात्त्विक-जीविताय, निर्ग्रन्थ-परम-ब्रह्म-हृदयाय, योगीन्द्र-प्राणनाथाय, त्रिभुवन-भव्य-कुल-नित्योत्सवाय, विज्ञानानन्द-परब्रहै-कात्म्य-सात्म्य-समाधये, हरि-हर-हिरण्य-गर्भादि-देवता-परिकलित -स्वरूपाय, सम्यग्-श्रद्धेयाय, सम्यग्ध्येयाय, सम्यक्-शरण्याय, सुसमाहित-सम्यक्-स्पृहणीयाय ॥2॥


ॐ नमोऽर्हते भगवते, आदिकराय, तीर्थकराय, स्वयं-सम्बुद्धाय, पुरुषोत्तमाय, पुरुष-सिंहाय, पुरुष-वर-पुण्डरीकाय, पुरुष-वर गन्धहस्तिने, लोकोत्तमाय, लोकनाथाय, लोक-हिताथ, लोक-प्रदीपाय, लोक-प्रद्योतकारिणे, अभयदाय, दृष्टिदाय, मुक्तिदाय, मार्गदाय, बोधिदाय, जीवदाय, शरणदाय, धर्मदाय, धर्म-देशकाय, धर्म-नायकाय, धर्म-सारथये, धर्म-वर-चातुरन्त चक्रवर्तिने, व्यावृत्तच्छाद्म ने अप्रतिहत-सम्यग्ज्ञान-दर्शन-सद्मेन ॥3॥


ॐ नमोऽर्हते जिनाय, जापकाय, तीर्णाय, तारकाय, बुद्धाय, बोधकाय, मुक्ताय, मोचकाय, त्रिकालविदे, पारङगताय. कर्माष्टक-निषूदनाय, अधीश्वराय, शम्भवे. जगत्प्रभवे, स्वयम्भुवे, जिनेश्वराय, स्याद्वाद-वादिने, सार्वाय, सर्वज्ञाय, सर्व दशिॅने, सर्व-तीर्थो-पनिषदे, सर्व-पाखण्ड(पाषण्ड)-मोचिने, सर्व-यज्ञ-फलात्मने, सर्वज्ञ-कलात्मने, सर्व-योग-रहस्याय, केवलिने, देवाधिदेवाय, वीतरागाय ॥4॥


ॐ नमोऽर्हते परमात्मने, परमाप्ताय, परम-कारुणिकाय, सुगताय, तथागताय, महा-हंसाय, हंस-राजाय, महा-सत्त्वाय, महा-शिवाय, महा-बोधाय, महा-मैत्राय, सुनिश्चिताय, विगत-द्वन्द्वाय गुणाब्धये लोकनाथाय जितमार- बलाय ॥5॥


ॐ नमोऽर्हते सनातनाय, उत्तम-श्लोकाय, मुकुन्दाय, गोविन्दाय, विष्णवे, जिष्णवे, अनन्ताय, अच्युताय, श्रीपतये, विश्वरूपाय, हृषिकेशाय. जगन्नाथाय. भू-र्भुवः स्वः - समुत्ताराय, मानंजराय , कालंजराय. ध्रुवाय , अजाय, अजेयाय, अजराय, अचलाय, अव्ययाय, विभवे, अचिन्त्याय, असंख्येयाय, आदि- संख्याय, आदि-केशवाय, आदि-शिवाय, महा-ब्रह्मणे, परम-शिवाय, एका-नेका-नन्त-स्वरूपिणे, भावा-भाव-विवर्जिताय, अस्ति-नास्ति-द्वयातीताय, पूण्य-पाप-विरहिताय, सुख-दुख- विविक्ताय, व्यक्ता-व्यक्त-स्वरूपाय, अनादि-मध्य-निधनाय, नमोस्तु, मुक्तिश्वराय, मुक्ति-स्वरूपाय ॥6॥


ॐ नमोऽर्हते निरातङ्काय, नि:सङ्गाय, नि:शङ्कर, निर्मलाय. निर्द्वन्द्वाय, निस्तरङ्गाय. निरुर्मये, निरामयाय, निष्कलङ्काय, परम-दैवताय, सदा-शिवाय, महा-देवाय, शङ्कराय, महेश्वराय, महा-व्रतिने, महा-योगिने, महात्मने, पंचमुखाय, मृत्युंजयाय, अष्टमुर्तये, भूतनाथाय, जगदानन्ददाय, जगत्पितामहाय, जगद्वेवाधिदेवाय, जगदीश्वराय, जगदादिकन्दाय, जगद् भास्वते, जगत्कर्म-साक्षिणे, जगच्चक्षुषे, त्रयीतनवे, अमृतकराय, शीतकराय, ज्योतिष्चक्र-चक्रिणे, महा-ज्योती-द्योतिताय, महातम: पारे सुप्रतिष्ठिताय, स्वयं कत्रे, स्वयं-हत्रे, स्वयं-पालकाय, आत्मेश्वराय, नमो-विश्वात्मने ॥7॥


ॐ नमोऽर्हते । सर्वदेवमयाय, सर्वध्यानमयाय, सर्वज्ञानमयाय, सर्व-तेजोमयाय, सर्वमंत्रमयाय, सर्वरहस्यमयाय, सर्व-भावाभाव-जीवा जीवेश्वराय, अरहस्य-रहस्याय, अस्पृह-स्पृहणीयाय, अचिन्त्य-चिन्तनीयाय, अकाम-कामधेनवे, असङ्-कल्पित-कल्पद्रुमाय, अचिन्त्य-चिन्तामणये, चतुर्दश-राज्ज्वात्मक-जीवलोक-चूडामणये, चतुरशीति-लक्ष-जीवयोनि-प्राणिनाथाय, पुरुषार्थ-नाथाय, परमार्थ नाथाय, अनाथ-नाथाय, जीवनाथाय, देव-दानव-मानव/ सिद्धसेनाधिनाथाय ॥8॥


ॐ नमोऽर्हते । निरञ्जनाय, अनन्त-कल्याण-निकेतन-कीर्तनाय, सुगृहीत-नामधेयाय, महिमा-मयाय धीरोदात्त-धीरोद्धत-धीरशान्त-धीरललित पुरुषोत्तम-पुण्यश्लोक-शत-सहस्त्र-लक्ष-कोटि-वन्दित-पादारविन्दाय, सर्व-गताय ॥9॥


ॐ नमोऽर्हते सर्व-समर्थाय, सर्व-प्रदाय, सर्व-हिताय, सर्वाधि-नाथाय, कस्मैचन-क्षेत्राय, पात्राय, तीर्थाय, पावनाय, पवित्राय, अनुत्तराय, उत्तराय, योगाचार्याय, संप्रक्षालनाय, प्रवराय, आग्रेयाय, वाचस्पतये, माङ्गल्याय, सर्वात्मनीनाय, सर्वार्थाय, अमृताय, सदोदिताय, ब्रह्मचारिणे, तायिने, दक्षिणीयाय, निर्विकाराय, व्र्षभ-नाराच-मूर्तये, तत्त्व -दर्शिने, पार-दर्शिने, परम-दर्शिने, निरुपम-ज्ञान-जल-वीर्य-तेज-शक्तायैश्वयॅ-मयाय, आदि-पुरुषाय, आदि-परमेष्ठिने, आदि-महेशाय, महा ज्योतिः सत्त्वाय, महार्चि-धनेश्वराय, महा-मोह-संहारिणे, महा-सत्त्वाय, महाज्ञा-महेन्द्राय, महा-लयाय, महा- शान्ताय, महा योगीन्द्राय, अयोगिने महा-महीयसे, महा-हंसाय, हंस-राजाय, महा-सिद्धाय, शिव-मचल-मरुज-मनन्त-मक्षय-मव्याबाध- मपुनरावृत्ति-महानन्द-महोदयं, सर्वदुःख-क्षयं, कैवल्य ममृतं, निर्वाण-मक्षरं, परब्रह्म- निःश्रेयस-मपुनर्भवं सिद्धिगति-नामधेयं स्थानं संप्राप्तवते, चराचर अवते, नमोऽस्तु श्री महावीराय, त्रिजगत्स्वामिने श्री वर्धमानाय ॥10॥


ॐ नमोऽर्हते केवलिने, परमयोगिने, ( भक्तिमार्ग-योगिने ), विशाल-शासनाय, सर्व-लब्धि-संपन्नाय. निर्विकल्पाय, कल्पनातिताय, कला-कलाप-कलिताय, विस्फुर-दुरु-शुक्ल-ध्यानाग्रि-नि र्दग्ध-कर्मबीजाय, प्राप्तान्त-चतुष्ट्याय, सौम्याय, शान्ताय, मङ्गल वरदाय, अष्टादश-दोष-रहिताय, संस्कृत-विश्व-समीहिताय स्वाहा



ॐ ह्रीं श्रीं अर्हम नमः ॥11॥


लोकोत्तमो निस्प्रतिमस्त्वमेव, त्वं शाश्वतं मंगलमप्यधीश

त्वामेडमर्हन् !शरणं प्रपधे, सिद्धर्षि सद्धर्ममयस्त्वमेवा ॥12॥


त्वं मे माता पिता नेता, देवो धर्मो गुरुः परः

प्राणा:स्वर्गोडपवर्गश्च सत्त्वं तत्त्वं गतिर्मतिः ।।13।।


जिनो दाता जिनो भोक्ता, जिनो सर्वमिदं जगत्

जिनो जयति सर्वत्र, यो जिन: सोडहमेव च ॥14॥


यत्किचित् कुर्महे देव, सदा सुकृत- दुष्कतम्

तन्मे निजपदा स्थस्य,हूं क्ष: क्षपय त्वं जिनः ॥15॥


गुह्याति गुह्य गोप्ता त्वं गृहाणा स्मत्कृतं जपम्

सिद्धिश्रयती मां येन,त्वत्प्रसादात्वयि स्थितम् ॥16॥

© Sheela Shet

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