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Parshva jinanda (Darwaja Tera Khol Khol Re)

पार्श्व जिणंदा (दरवाजा तेरा खोल खोल रे) | Parshva jinanda (Darwaja Tera Khol Khol Re)

Manali Sankhala

Stotra

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Lyrics of Parshva jinanda (Darwaja Tera Khol Khol Re) by Stavan.co

शान्तिं शान्ति-निशान्तं,

शान्तं शान्ता-शिवं नमस्कृत्य

स्तोतुः शान्ति-निमित्तं,

मन्त्र-पदैः शान्तये स्तौमि......1


ओमिति निश्चित-वचसे,

नमो नमो भगवतेर्हते पूजाम्

शान्ति-जिनाय जयवते,

यशस्विने स्वामिने दमिनाम्....... .2


सकलातिशेषक-महा-संपत्ति-समन्विताय शस्याय.

त्रैलोक्य-पूजिताय च,

नमो नमः शान्ति-देवाय.....3


सर्वामर-सुसमूह-स्वामिक-संपूजिताय न जिताय.

भुवन-जन-पालनोद्यत-तमाय

सततं नमस्तस्मै.....4


सर्व-दुरितौघ-नाशन-कराय

सर्वाशिव-प्रशमनाय

दुष्ट ग्रह-भूत-पिशाच-शाकिनीनां प्रमथनाय.............5


यस्येति नाम-मन्त्र-प्रधान-वाक्योपयोग-कृत-तोषा.

विजया कुरुते जन-हित-मिति च नुता नमत तं शान्तिम्.......6


भवतु नमस्ते भगवति!,

विजये! सुजये! परा-परैरजिते!.

अपराजिते! जगत्यां,

जयतीति जयावहे! भवति......7


सर्वस्यापि च संघस्य,

भद्र-कल्याण-मंगल-प्रददे!.

साधूनां च सदा शिव-सुतुष्टि-पुष्टि-प्रदे! जीयाः ......8


भव्यानां कृत-सिद्धे!,

निर्वृति-निर्वाण-जननि! सत्त्वानाम्.

अभय-प्रदान-निरते!,

नमोस्तु स्वस्ति-प्रदे! तुभ्यम्..... .9


भक्तानां जन्तूनां, शुभावहे! नित्यमुद्यते! देवि!.

सम्यग्-दृष्टीनां

धृति-रति-मति-बुद्धि-प्रदानाय......10


जिन-शासन-निरतानां,

शान्ति-नतानां च जगति जनतानाम्.

श्री-संपत्कीर्ति-यशो-वर्द्धनि!,

जय देवि! विजयस्व......11


सलिला-नल-विष-विषधर-दुष्ट-ग्रह-राज-रोग-रण-भयतः.

राक्षस-रिपु-गण-मारि-चौरेति-श्वापदा-दिभ्यः.....12


अथ रक्ष रक्ष सुशिवं,

कुरु कुरु शान्तिं च कुरु कुरु सदेति

तुष्टिं कुरु कुरु पुष्टिं,

कुरु कुरु स्वस्तिं च कुरु कुरु त्वम्..13


भगवति! गुणवति! शिव-शान्ति-

तुष्टि-पुष्टि-स्वस्तीह कुरु कुरु जनानाम्.

ओमिति नमो नमो ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रः,

यः क्षः ह्रीँ फट् फट् स्वाहा.......14


एवं-यन्नामाक्षर-पुरस्सरं, संस्तुता जया-देवी.

कुरुते शान्तिं नमतां,

नमो नमः शान्तये तस्मै........15


इति पूर्व-सूरि-दर्शित-मन्त्र-पद-विदर्भितः स्तवः शान्तेः.

सलिलादि-भय-विनाशी,

शान्त्यादि-करश्च भक्तिमताम्.....16


यश्चैनं पठति सदा,

शृणोति भावयति वा यथा-योगम्

स हि शान्ति-पदं यायात्,

सूरिः श्री-मान-देवश्च.....17


उपसर्गाः क्षयं यान्ति, छिद्यन्ते विघ्न-वल्लयः

मनः प्रसन्नतामेति, पूज्यमाने जिनेश्वरे...18


सर्व-मंगल-मांगल्यं, सर्व-कल्याण-कारणम्

प्रधानं सर्व-धर्माणां, जैनं जयति शासनम् 19

© Bhakti Mala

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